• Kuch to Khaas tha unmein: A poem by Bhargavi Ravindra

    तब मैं समझ न पाई ,समझने की वो उमर भी नहीं थी और , तब शायद इतनी समझ भी नहीं थी पर आज उमर की सीढ़ियों को पार करते ज़िंदगी का एक लंबा सफर तय करते आज मैं जिस मक़ाम पर पहुँच पाई हूँ ये उनकी बदौलत ही कर पाई हूँ।। ये जो कविता,शेर ओ शायरी का जुनून है  और मेरी इन कविताओं में जो सुकून है  ये उन्हीं की दी हुई विरासत है  उनसे मिली ये दौलत है । मुतासिर करने वाली कोई तो बात थी  दिल को छू लेने वाली एक सौग़ात थी । जब भी अपना बचपन याद आता है  एक चेहरा आँखों के सामने घूम जाता है  साफ़ सुथरे पन्नों पर वो बेतरतीब सी लिखाई  बचपन की मासूमियत में तब बात समझ न आई, हम क्या कहना चाहते थे अपनेआप से  मगर बिना कहे वो समझ गईं,चूपचाप से! आज जब इतना सबकुछ लिखने बैठी हूँ ख़्वाब है कोई या हक़ीक़त ,सोचती हूँ  वो उनके मिज़ाज मे , बातों में मिठास आज वो मुझसे बहुत दूर है,मगर लगता है –हैं आसपास हिंदी से कैसे जुड़ गई मैं,अकसर सोचती थी मन में  मगर,आज इस उमर में ये बात समझ आई….कुछ तो ख़ास था उनमें !

  • Kuch to khaas tha unmein: A poem by Krishna Budakoti

    एक प्यार ,एक जुनून था उनमें,कुछ तो खास था उनमें । ‘ वो ‘ मिले तो दिल धड़क जाए,न मिले तो धड़कन रुक जाए।सूना-सूना-सा लगता...

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