सप्तऋषि तारामंडल की आकृति
आकाश में दिखाई देती है
एक करछुल, कड़ाही या प्रश्न चिन्ह की तरह
यह उत्तरी गोलार्ध में
सात मुख्य तारों का है एक समूह
यह एक बड़ी चम्मच या पतंग जो आकाश में डोर के साथ उड़ रही हो जैसी बनाता है आकृति
इस समूह के सात तारों के नाम भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार हैं
क्रतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरस, वशिष्ठ और मारीचि
यह उत्तर दिशा में है स्थित और
ध्रुव तारे को खोजने में मदद है करता इसे आमतौर पर फाल्गुन-चैत या फरवरी-मार्च से श्रावण-भाद्र या अगस्त-सितंबर महीने तक स्पष्ट है देखा जा सकता
सप्तऋषि तारामंडल को देखकर
मुझमें भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और खगोल विज्ञान के अद्भुत संगम के विचार हैं आते
यह ज्ञान, गोत्र परंपरा और
प्राचीन ऋषियों जैसे वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि के तप का है प्रतीक
यह सूचक है उत्तर दिशा का जो दिशाहीनता में मार्गदर्शक और अडिगता की प्रेरणा है देता
सप्तऋषि दर्शन पर मैं सोचती हूं कि यह सात तारे मात्र प्रकाश के बिंदु नहीं बल्कि
उन महान ऋषियों की चेतना हैं
जिन्होंने वेदों और ज्ञान के माध्यम से मानवता को राह दिखाई
यह स्मरण करती हूं कि सप्तऋषि हमारे गोत्र के पुरखे हैं जो हमारे मूल और ऋषियों के त्याग के प्रति कृतज्ञता की भावना
पैदा है करता
यह विचार आता है कि जिस तरह वे ध्रुव तारे के पास होकर
अंधकार में दिशा दिखाते हैं वैसे ही
वे जीवन के अज्ञान को दूर कर
ज्ञान का प्रकाश हैं फैलाते
यह अनुभव करती हूं कि
प्रकृति में एक निश्चित व्यवस्था है जिसे ये ऋषि युगों से नियंत्रित कर रहे हैं
यह आश्चर्य करती हूं कि
हजारों साल पहले ही हमारे ग्रंथो ने इन सात तारों की पहचान कर ली थी जो आधुनिक खगोल विज्ञान और प्राचीन ज्ञान के तालमेल को है दर्शाता
इन्हें देखना हम सभी को
अपनी जड़ों, प्राचीन ऋषियों के योगदान और ब्रह्मांडीय चेतना से है जोड़ता।
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