वह तो एक सूखा हुआ मरुस्थल था


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मैंने शीशे की तरफ देखा वह नंगी आंखों से देखने पर तो
साबुत लग रहा था लेकिन
भीतर से
पूरी तौर से टूटा हुआ था
अनगिनत दरारों से भरा हुआ था
जख्मों को अपने अंदर पाले हुए था
उसकी देह नुकीली थी
एक कांटो की शैय्या पर
अपना जीवन बसर कर रही थी
कोई फूल उसकी बगिया की
मिट्टी से न उपजता था
न खिलता था
न महकता था
वह तो एक सूखा हुआ मरुस्थल था जो
बारिश के जल की
एक बूंद के लिए
आसमान की तरफ टकटकी लगाये
अपनी जलती हुई काली परछाई को
जमीन पर भटकते
अपनी पथराई बेबस आंखों से तक रहा था।


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