मन के कानों ने सुना


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जहाँ तक मेरा मुझसे तअल्लुक़ है,
मैं मन ही मन खुद से बातें,
दिल खोल कर हर विषय पर करती ही रहती हूँ।
ऐसा कुछ भी शेष नहीं,
जो मैंने अपने मन के कानों में न कहा हो,
और उसने पूरी तन्मयता से न सुना हो।

लेकिन इस दुनिया के लोगों से
जब भी संवाद होता है,
तो आधा-अधूरा ही रह जाता है।
जो मैं कहती हूँ, वह भी सामने वाला
हाँ में गर्दन हिलाता है, लेकिन
ध्यानपूर्वक कुछ भी सुनता नहीं।

हर कोई चाहता है कि सामने वाला उसकी सुने,
पर वह खुद कुछ भी गंभीरता से नहीं सुनता।
जो कहा, वह भी नहीं सुना गया,
तो जो कह नहीं पाए, वह तो फिर भीतर ही,
मन के किसी कोने में दफ़न हो गया।

यह तो बड़ी किस्मत की बात होती है,
कि कुछ लोग जो ख़ामोश होकर
अपनी आँखों से संवाद करते हैं,
उनके इशारे उनके किसी चाहने वाले को,
जैसा वह बिन बोले कहना चाह रहे हों,
समझ आ जाएँ।


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