क्रोध में बोध को खोती


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माथे पर लाल बिंदी
होठों पर सुर्ख लाली
देह पर लाल रंग का लहंगा पहने
सिर पर लाल ही रंग की चुनरिया लपेटे
चोली का रंग भी लाल
तुम्हारी चूड़ियों का रंग भी लाल
सिर से पांव तक
तुम आज लाल ही लाल
लाल रंग में तुम गजब ढाती हो
तुम्हारा चेहरा भी सुर्ख लाल है
एक सूरज की लालिमा सा
अंगारे बरसाता दहक रहा है
तुम्हारा बदन तेज ताप में
शोले उगलता सुलग रहा है
तुम्हारी आंखें भी जलते हुए लाल कोयले सी धधक रही हैं
तुम्हारी दिल की धड़कने अति तीव्र गति से चल रही हैं
तुम एक आंधी के तेज वेग में जैसे
हिलती सी कांप रही हो
यह जो रूप तुमने धारण किया है
वह किसी देवी, प्रेयसी या
अप्सरा का न होकर
सौंदर्य को समाप्त करता
एक रौद्र आकृति को उजागर कर रहा है
तुम प्रतिशोध की ज्वाला में
जल रही हो
तुम एक जलती हुई चिता पर
बैठकर खुद को ही कहीं नुकसान
पहुंचा रही हो
तुम कहीं गहरी पीड़ा से गुजर
रही हो लेकिन
क्रोध में बोध को खोती
एक आत्म-विनाशकारी कृत्य को
प्रतिपादित कर रही हो
एक माचिस का उपयोग कर
दूसरों को जलाने से पहले खुद को कहीं
नष्ट कर रही हो।


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