अनकहे शब्द
जो कहे नहीं जाते
मन के भीतर ही कहीं
सिमट जाते हैं
वह एक भंवर बनकर
एक गोल घेरे में
बेतहाशा शोर मचाते हुए
लगातार चक्कर पर चक्कर काटते ही रहते हैं
यह एक पल को भी रुकते नहीं है
यह एक गूंज बनकर
खुद के ही कानों के पर्दों से टकराते रहते हैं
इनका भार समय के साथ घटता
नहीं है
सच तो यह है कि यह बढ़ता ही
चला जाता है
सबसे अधिक परेशान करता है तो
सबसे पहले खुद को ही
कई बार तो इसकी कीमत
किसी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है
एक खंडहर जैसे खालीपन से भी
यह जब तब किसी का सामना
कराता है
मन में घुटन पैदा करता है
दिल में दर्द का समुंदर बरपा देता है
यह स्थिति तकलीफदेह है
बेहतर है कि जो कहना है
बेझिझक कह दें
कुछ भी अपने भीतर संजोते न रहें
यह कोई खजाना नहीं है जो
किसी दुख की घड़ी में काम आयेगा
यह तो खुद ही दुख की जननी है
इन अनकहे शब्दों को
तो पक्षियों की तरह
हवा में उड़ा दें
अपने दिल की पेड़ की डाली पर
तो इन्हें
बिल्कुल भी बसेरा न करने दें।
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