सांझ होने पर
पंछी एक कतार में
एक दिशा में
उड़ते चले जाते हैं
अपने आशियाने की तरफ ही
जाते होंगे
कैसे बना लेते हैं
यह आसमान में भी
अपने घर की तरफ लौटते
रास्तों को
लोग तो जमीन पर भी
अपने घर के पते,
उसमें रहते लोगों,
उनसे जुड़ी यादों
उन रास्तों पर आते-जाते,
बनते बिगड़ते पदचिन्हों
उन बूढ़ी आंखों में पलते
सपनों की उम्मीद भरी लकीरों
सब कुछ तो भूल जाते हैं।
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