मैंने अग्नि के सात फेरे लिए हैं
पर किसी के साथ नहीं – खुद के साथ
ये फेरे बंधन के नहीं, विद्रोह के हैं
हर फेरे पर एक जंजीर तोड़ी है मैंने।
पहला फेरा – डर का
अग्नि ने पूछा "जलेगी?" मैंने कहा "हाँ, पर डरूँगी नहीं"
डर को वहीं भस्म किया और आगे बढ़ गई।
दूसरा फेरा – समाज का
लोग बोले "लड़की है, हद में रह"
मैंने अग्नि को देखा, उसने कहा "हद तो कायर बनाते हैं"
मैं हद लाँघ गई।
तीसरा फेरा – खामोशी का
बहुत सहा, बहुत चुप रही
इस फेरे में अपनी चुप को आग के हवाले किया
अब जो बोलूँगी, पहाड़ हिला दूँगी।
चौथा फेरा – रिश्तों का
जो अपने थे वो परखे गये इस लपट में
खोट निकला, जल गया, खरा निकला, निखर गया
अब भीड़ नहीं, बस चंद अंगारे मेरे साथ हैं।
पाँचवा फेरा – हार का
गिरी, टूटी, बिखरी
पर अग्नि ने कहा "राख से ही नया जन्म होता है"
मैं राख से उठी, फौलाद बनकर
छठा फेरा – पहचान का
नाम किसी और का नहीं चाहिए
काम ऐसा करूँगी कि अग्नि भी मेरा नाम ले
मैं परछाई नहीं, खुद सूरज हूँ
सातवाँ फेरा – संकल्प का
अग्नि को साक्षी मानकर कसम खाती हूँ
मैं मोम बनकर पिघलूँगी नहीं,
मैं ज्वाला बनकर युग बदलूँगी।
सुनो, लोगों ने सात फेरे लेकर घर बसाए,
मैंने सात फेरे लेकर खुद को गढ़ा
उनकी अग्नि ठंडी पड़ जाती है फेरों के बाद,
मेरी अग्नि तो सातवें फेरे के बाद भड़कती है
मैं वो नहीं जो फेरे लेकर झुक जाये
मैं वो हूँ जो अग्नि के सात फेरे लेकर
खुद अग्नि बन जाये।
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