• Raat din Priyavar ki yaad: A poem by Dr. Suresh Kumar

    कुंठित मन की कुंठा मन में कूट-कूट कुम्ह्लाती है. प्राण प्रिये प्रियवर की याद..रात दिन सताती है.. क्षण भर की भी दूरी जो, मन को...

  • Raat din Priyavar ki yaad: A poem by Dr. Suresh Kumar

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  • Raat aur din: A poem by Nisha Tandon

    दिन थक कर जब हारे उसे बेसब्री से रात का इंतेज़ार होता हैऔर फिर ना जाने कितनी दफ़ा वो उसकी नाज़ोंअदा से बेज़ार होता हैधीरे...

  • Raat aur din: A poem by Nisha Tandon

    दिन थक कर जब हारे उसे बेसब्री से रात का इंतेज़ार होता हैऔर फिर ना जाने कितनी दफ़ा वो उसकी नाज़ोंअदा से बेज़ार होता हैधीरे...

  • Raat aur din: A poem by Ratna Shridhar

     मानस पटल पर अंकित, सृष्टि रचयिता के दो विरोधाभास:  सकारात्मकता और नकारात्मकता के दो आयाम | दिन के आरंभ होते ही विहग का  कलरव, अंतहीन उड़ान की तैयारी,...

  • Raat aur din: A poem by Ratna Shridhar

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  • Kansa raatri, Krishna savera: A poem by Mani Saxena

    मध्य रात्रि, रोहिणी नक्षत्र में कान्हा हुए अवतरित,बंदीगृह में बेड़ियाँ पहनी देवकी माँ भी हुई हर्षित,चीरता हुआ काली रात, प्रकाश हो गया प्रज्वलित,चतुर्भुज ने दिखायी...

  • Kansa raatri, Krishna savera: A poem by Mani Saxena

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