एक बीता हुआ कल


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हमारे पुरखों की
तीन मंजिला हवेली जो
हमारे मूल स्थान में ही स्थित है
समय के साथ
पुरानी, कमजोर और जर्जर हो रही है
हाल फिलहाल में
इसका एक हिस्सा भी अचानक
भरभराकर ढह गया
यह तो गनीमत रही कि
इस दौरान उसमें कोई रह नहीं रहा था और
कोई इस हादसे का शिकार नहीं हुआ
यह मेरे परदादा की हवेली है
एक बीता हुआ कल
पलक झपकते ही यादों में परिवर्तन हो
जाता है
ऐसी खाली खंडहर होती
इमारतों में फिर बस
यादें ही गूंजती रहती हैं
लोग उसमें घुसने या बसने की
हिम्मत नहीं जुटा पाते
इन इमारतों को कितना भी
ठीक करने की बीच-बीच में
कोशिश करते रहो जैसे
मरम्मत आदि से लेकिन
एक बार यह भी
इंसानों की तरह
अपनी एक उम्र पूरी कर लेने के बाद
दोबारा फिर ठीक नहीं हो पाती
इनमें कभी जो लोग रह रहे होते थे
वह भी किसी रोज परिंदों की तरह
न जाने कौन सी दूसरी दुनिया की ओर उड़ जाते हैं
कितना पुराना और बेशकीमती
सामान इनके कमरों में
यूं ही पड़ा रह जाता है
इस्तेमाल भी कोई कर पाता नहीं
इसके मलबे के नीचे ही दब जाता है
कोई इनकी तरफ मुंह उठाकर भी नहीं देखता
न इनमें घुसकर
कोई सामान उठाने की
कोशिश करता क्योंकि
हर किसी को अपनी जान प्यारी होती है
कोई किसी हादसे का शिकार नहीं होना चाहता
बस आंखों में ही
इनसे जुड़ी यादों के
चलचित्र से चलते रहते हैं
इनके करीब जाकर इन्हें छूकर तो
कोई देखना नहीं चाहता
यह इमारत पूरी तौर पर
चाहे न भी गिरी हो
आंशिक तौर पर ढही हो पर
अब यह अधूरी है
खाली है
वीरान है
भयावह है
एक कब्रिस्तान में पसरी
खामोशी की दास्तान सी है
यह एक कहानी थी जो
समय के दरिया में बह गई
आज की तारीख में
इसे पूछने वाला कोई नहीं
इसकी लकड़ी के पुराने
दरवाजे पर एक जंग लगा
ताला जो पड़ रहा है
उसे भी खोलने वाला या
इसे भूले से भी कोई
खटखटाने वाला नहीं है।


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