कटाक्ष


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मेरे घर की डोर बेल बज रही थी। मैं अपनी बुआ जी के साथ मोबाइल पर बातचीत कर रही थी। कान पर मोबाइल लगाए बातचीत जारी रखते हुए ही मैंने दरवाजा खोल दिया और अपनी दोस्त नीलिमा को इशारे से कुर्सी पर बैठने को कहा।औपचारिकतावश मैंने मोबाइल नीलिमा को थमाते हुए उसे भी बुआ जी से थोड़ा बहुत वार्तालाप करने को कहा।
बुआ जी को नमस्ते करके नीलिमा ने कहा,'बुआ जी, हमारे पास घूमने आ जाइये।'
आदत से मजबूर बुआ जी तपाक से ताने मारने पर उतर आईं। वह कहने लगी, 'अरे कहां आऊं! अब भाई तो रहे नहीं। किसके पास रुकूंगी।' नीलिमा बोली, 'मेरा घर भी तो आपके भाई का ही घर है। आप मेरे पास ठहरना।'
मेरी बुआ जी क्या नीलिमा के प्रश्न का उत्तर यह नहीं दे सकती थी कि अवश्य आयेंगे और तुमसे भी मिलेंगे।
एक सरल बात को जटिल बनाना और वह भी हर समय कोई सही आचरण नहीं है।
उम्र के हिसाब से न सही पर जीवन के अनुभव और रिश्ते के अनुरूप व्यक्ति को अपना बड़प्पन दिखाना चाहिए।
किसी के दिल में अपनी एक अच्छी छवि बनानी चाहिए। इस तरह का हरदम ही कटाक्ष करता कटु व्यवहार निश्चित रूप से किसी के मन मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालता है। ऐसे में वह आपसे एक दूरी बनाये तो फिर इसमें आश्चर्य कैसा!


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