एक घर की छत के नीचे
सब रह रहे
एक साथ मिलकर नहीं
एक दूसरे से जुदा होकर
एक दूसरे का दिल रखने के बजाय
एक दूसरे को जख्म दे रहे
जख्म को हरा ही रखते हैं
उसे भरने ही नहीं देते
जैसे ही कुछ ठीक होने पर आता है
उसे कुरेदना शुरू कर देते हैं
इस तरह की मानसिकता के लोग
जीवन को गंभीरता से क्यों नहीं लेते
इनकी जिंदगी का मकसद क्या है
खून के रिश्तों को भी गर
ये लोग संजों न पाये तो
इन्होंने जिंदगी में आखिरकार
हासिल क्या किया
यह खुद को महारथी समझते हैं लेकिन
यह डरे हुए, हारे हुए और
मानसिक रूप से कमजोर लोग हैं
इन्हें समझना मुश्किल है
एक बार इनके जाल में फंस गये तो
उससे बाहर निकलना कठिन है
भगवान से यही प्रार्थना है कि
इन लोगों को सद्बुद्धि दे
यह खुद एक अच्छा जीवन
व्यतीत करें और
दूसरों को भी जीने दें
बेमतलब किसी को कम से कम
बिना बात परेशान तो न करें।
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