परिवार में रहते हुए
परिवार के सदस्यों में
एक दूसरे के प्रति प्रेम हो,
आदर हो,
सहयोग हो तो ही
उसका कोई अर्थ है,
महत्व है,
समाज में स्थान है अन्यथा
यह भी एक व्यक्तियों का समूह मात्र है
एक दुनिया का हिस्सा है
एक मेला है
एक तमाशा है
एक बूढ़े कंधे पर पड़ता
दिन प्रतिदिन भार में बढ़ता
कोई बोझ ही है
परिवार में रहते
जिसे मिलती हैं खुशियां
वह उसकी प्रशंसा करेगा ही लेकिन
जिसके साथ हो ठीक इसके विपरीत
वह करे भी तो आखिर फिर क्या करे
परिवार की परिभाषाएं भी
लोग अपनी सुविधानुसार बदलते
रहते हैं
रिश्तों का आजकल
कोई मोल नहीं रह गया
इसमें कोई सच्चाई या स्थायित्व नहीं
कौन सा रिश्ता
कब मुंह मोड़ ले
कहना मुश्किल है
रिश्तों में समय खर्च करने से बेहतर तो
खुद की तरक्की करने में ही अधिक ध्यान दें
परिवार से कम अपेक्षा रखें
कोई मदद कर दे तो उसका भला
यदि न करे तो भी उसका धन्यवाद करें और
आगे बढ़े
अपनी मदद के लिए
पहले अपने हाथ ही आगे बढ़ायें
परिवार हो या यह समाज या यह दुनिया
इनमें से किसी की भी
आजीवन साथ देने की कोई गारंटी नहीं
खुद को पहले मजबूत बनायें
कोई मुसीबत पड़ने पर भी न दे साथ तो
चिंता त्यागकर
सब भगवान भरोसे छोड़ें।
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