जीवन तुम्हारे मन के भीतर निहित है


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जीवन को क्या तलाशते हो
इस बाहरी दुनिया में
वह तो तुम्हारे मन के भीतर ही निहित है
दर-दर भटककर
तुम्हें अंत में आना तो है
अपनी पनाहों में ही फिर
इस तरह का भटकाव
दिल में लिए तुम आखिरकार पाते क्या हो
प्रभु को पाना है तो
शुरुआत खुद से करो
खुद के अंतर्मन को टटोलो और
मनन करके कुछ स्वर्ण जैसा अमूल्य
चाहे हो वह कुछ भी
अपनी झोली में भरो
यह दुनिया तो बहुत विचित्र और विशाल है
इसे जितना जानने की कोशिश करोगे
उतना उलझते चले जाओगे
जीवन में बस इतना भर जानो जो
तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण हो
उपयोगी हो
पर्याप्त हो
बिना बात अपनी राह से जो ज्यादा भटके तो
अंत में तुम्हारे हाथ पछतावे के सिवाय
कुछ और नहीं आयेगा।


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