गौरैया तुम तो लुप्त हो गई हो


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गौरैया
तुम तो लगभग लुप्त सी ही हो गई हो
कभी कभार
तुम दिख जाती हो तो
तुमसे ज्यादा तो कहीं
मैं तुम्हें देख इतनी प्रसन्न हो जाती हूं कि
तुमसे अधिक तो कहीं
मैं ही एक चिड़िया सी चहकने लगती हूं
जब मैं छोटी थी तो
मुझे अच्छे से याद है कि
तुम घर के आंगन में
एक परिवार के सदस्य की तरह ही
दिन भर झुंडों में विचरती रहती थी
क्यारियों में भरी कच्ची मिट्टी से
बीज, कीड़े, अपना भोजन चुगती और
खाती रहती थी
कोई तुम्हारे समीप भी आ जाये तो तुम
उससे भयभीत होकर उड़कर कहीं दूर
नहीं बैठ जाती थी
अपने पूरे आत्मविश्वास के साथ
अपने स्थान पर टिकी रहती थी
समय ने ऐसी करवट ली है कि
तुम भी इससे अछूती नहीं रही हो
आकार में कितनी छोटी सी हो तुम लेकिन
तुम्हारी बुद्धि अति तीव्र है
तुम संवेदनशील हो
मनुष्यों के बढ़ते अत्याचारों से
अनभिज्ञ नहीं हो तुम
शहरों में बढ़ती भीड़ और प्रदूषण ने
तुम्हारा जीना दूभर कर दिया है
तुम वाहनों के शोर, बिजली की तारों के
बिछे एक जानलेवा जाल, तुम्हारी अवहेलना,
तुम्हारे आहार और आवास की कमी,
तुम्हारे साथ बढ़ती दुर्घटनाएं आदि से
कहीं भीतर तक भयभीत हो गई हो  
तुम शहरों को अलविदा कह चुकी हो
तुम भी एक तपस्वी सी हो
समझदार तो हो ही सो
तुम्हें एकांत ही प्रिय है
गांव में, बागों में, खेतों में, जंगलों में,
नदी किनारे तो तुम
एक बार को दिख भी जाती हो
शहरों में तो भूले भटके दिखती हो
लगता है यहां का चलन तुम्हें नापसंद है
तभी कर ली है तुमने इस जगह से तौबा।


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