कुछ तो
हर जीव के भीतर है ही जो
उसके जीवन को चला रहा है
इस दुनिया से उसका सामंजस्य स्थापित
करा पा रहा है
इस प्रकृति के कण-कण को सजा रहा है
इस शक्ति को
कोई भी नाम दे दो
चाहे तो परमेश्वर, ईश्वर,
भगवान, प्रभु, देव आदि
नाम अनेक हो सकते हैं लेकिन
उससे तन, मन और आत्मा का
रिश्ता सबका एक ही है
सबका भक्ति भाव एक ही है
सबकी अनुभूति एक ही है
बाहर की दुनिया में तो
भटकाव बहुत है
वहां ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती
कहने को तो वह सर्वत्र व्याप्त है
कोई मनुष्य जो
एकाग्रचित होकर
झांक पाये अपने मन के भीतर तो
उसका संपूर्ण ध्यान एक बिंदु पर
केंद्रित हो पाता है
इस अवस्था में
सब कुछ भुलाकर
सब कुछ त्यागकर
सब कुछ बिसराकर
वह प्रभु को एक संपूर्ण
समर्पित भक्ति भाव से
अपने ही भीतर पा सकता है
भगवान तो किसी के
मन मंदिर में ही विराजे होते हैं
तू खुद को तलाश और
खुदा तक पहुंच
उसकी जैसी हो आज्ञा फिर
वैसा कार्य कर अपना और
जग का कल्याण कर।
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