पदचिन्ह कभी मिटते नहीं


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शून्य को
कोई चाहे तो आकाश सरीखा
एक भयभीत करता खालीपन
मान सकता है लेकिन
मैं इसे जीवन का एक चक्र जैसा समझती हूं
यह संपूर्ण है
पूर्ण रूप से परिपूर्ण
आरंभ से अंत तक
हर पल, हर पग,
हर प्रयत्न में अपने आप में पूर्ण है
किसी भी राह पर
चाहे हो वह कैसी भी
पदचिन्ह बनते भी हैं और
समय के साथ मिटते भी हैं
मैं अतीत में थी लेकिन
अब तो इस पल में हूं
वर्तमान में मेरा अस्तित्व
मुझे साथ लिए
मौजूद है
अतीत में तो मेरी यादों के
पदचिन्ह हैं जो
मेरी स्मृतियों के पटल पर
अभी भी जीवित हैं
शून्य हो या अनंत
इन पर बनते
पदचिन्ह आंख से बेशक न
दिखते हों लेकिन
कभी मिटते नहीं
यह सांस भरते रहते हैं
मन के ही किसी कोने में
शर्त बस इतनी भर है कि
आपका जीवित होना
अति आवश्यक है।


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