मेरा बस चले तो
मैं कल को
आज में बदलने न दूं
घर के हर कमरे के
खिड़की, दरवाजे और रोशनदान
बंद कर दूं और
कल की खुशनुमा यादों को
एक बहते हवा के झोंके सा
एक खुशबू के गुबार की तरह
अपनी सांसों में बसा लूं
उन्हें अपने अन्तर्मन में
हमेशा के लिए
कैद कर लूं
उन्हें तस्वीरों की शक्ल दे दूं
जो मुझसे एक जीते जागते
इंसान सी बातें करती हों
मैं बीते कल के पलों की
हर एक स्मृतियों को
दीवार में कील गाड़कर
एक खूंटे से बंधी गाय सा ही
बांध दूं
सब कुछ जब हाथ से
निकलता चला जाता है
पीछे छूटता चला जाता है
कुछ भी अपने मन मुताबिक
पकड़ में नहीं आता है तो
दिल तड़पकर रह जाता है
एक अजीब सी बेचैनी और
बेबसी
मन के हर कोने में घर कर
जाती है
काश! यह दीवारें बस खड़े
रहने का काम न करके
अपना फर्ज भी अदा
करती
अतीत को
अपने पाशों में बांध
सकने की कुव्वत तो
कम से कम रखती।
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