प्रेम की भाषा से
प्रेम का रस ही छलकना चाहिए
कुछ और नहीं
प्रेम भाषा में ही नहीं अपितु
मन के भावों में और
आंखों की भंगिमाओं में भी
होना चाहिए
प्रेम किसी से नहीं है तो
प्रेम का छल न करें
प्रेम का महज दिखावा न करें
प्रेम का एक झूठा प्रदर्शन न करें
खामोश हो जायें
यह एक बेहतर विकल्प है
एक से प्रेम है और
चार से नहीं तो
यह तो भेदभाव हुआ
तू फिर एक प्रेमी हृदय है ही नहीं
तेरे दिल में फिर प्रेम का अभाव है
तेरे में कमियां ही
कमियां हैं
तू प्रेम विहीन है
तू प्रेम का सही अर्थ फिर नहीं जानता
प्रेम का जिसके हृदय में वास
होता है
वह सबके लिए समान होता है
प्रेम ईश्वर सदृश्य है
मंदिर में स्थापित ईश्वर की
मूर्ति अपने भक्तों में
कभी भेद नहीं करती
वहां प्रेम का प्रसाद बंटता है
समान मात्रा में
बिना किसी सिफारिश के,
आडंबर के और
नाइंसाफी के।
0 Comments