अज्ञात की सीमा पर


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अज्ञात की सीमा पर
खड़ा मन यह सोचे कि
जो अज्ञात है गर
वह अतीत के ज्ञान के साथ
तालमेल बिठा पायेगा और
अनिश्चितता से भरा नहीं होगा तो
एक अनजाने डर को
तिलांजलि दे पायेगा अन्यथा नहीं
कुछ भी जब तक
हाथ नहीं आता
वह होता है
अज्ञात ही
पकड़ में जब आता है कि
वह अब वर्तमान के उस पल में है
ज्ञात या अज्ञात
अज्ञात को लेकर
मनुष्य को भयभीत नहीं
होना चाहिए बल्कि
आशावादी होना चाहिए
हो सकता है
कभी मन मुताबिक
कामयाबी हासिल न भी हो
परिणाम घातक हो तो फिर
क्या हुआ
यह भी तो सीखने की ही एक
प्रक्रिया है
हे मनुष्य! ज्ञात अज्ञात के भंवर से
तू खुद को बाहर निकाल
एक सहज भाव से अपना
जीवनयापन कर
तू खाली हाथ आया था
इस संसार से ऐसे ही
खाली हाथ चला जायेगा
भागता रह चाहे फिर कितना भी
अज्ञात के पीछे और
बटोरता रह चाहे दुनिया भर का
ज्ञान अपनी झोली में।


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