एक अबोध बालक की तरह


0

दिल मेरा
एक मखमली फूल सा
कोमल है
एक खिली हुई
गुलाबी रंगत तो नहीं है मेरी लेकिन
गुलाबों की बहारों सा महकता
गुलाबी रंग
शायद मेरे मन के मयखाने में
कहीं महकता है
मेरा आकार
पानी के माफिक है
जहां जैसी परिस्थिति देखता है
खुद को वैसा ढाल लेता है
मीठा है
पीने योग्य है
लाभकारी है
जीवन में जैसे जल उपयोगी है
वैसे ही मेरा आकार भी
मेरा ध्यान
न जाने क्यों
शून्य की तरफ आकर्षित
हो रहा है
मैं संभवतः एक शून्य ही हूं
मैं खुद में पूर्ण हूं लेकिन
हर सुबह जब मेरी
इस दुनिया में आंख खुलती है तो
मेरा जन्म नया होता है
मैं हर रोज शून्य से ही
अपने दिन की शुरुआत
करती हूं और
एक अबोध बालक की तरह
जीवन की पुस्तक का
हर पृष्ठ प्रथम दृष्टया की तरह
खुद में समाहित करती हूं।


Like it? Share with your friends!

0

0 Comments

Choose A Format
Story
Formatted Text with Embeds and Visuals