मृग है तो
तृष्णा है
वास्तविकता है तो
उसके भ्रम का आभास है
मृग तो रहेगा
उसकी प्यास भी रहेगी
दोनों के रहने में कोई बुराई भी
नहीं
प्यास तो जगेगी
वह बुझे न बुझे
यह अलग बात है
जल के स्रोत तो तलाशे जायेंगे
वह मिलें या न मिलें
यह अलग समस्या है
सपने पूर्ण न हों
खुली आंखों से
यह संसार देखने पर तो
आंखें बंद करके
मृगतृष्णाओं के जाल में फंसकर
उन्हें साकार करने में हर्ज ही क्या है
वास्तविकता भी तो देखा जाये
वास्तविक नहीं
ऐसे में
किसी भ्रम को वास्तविक मान भी लें तो
इसमें नुकसान ही क्या है।
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