रात को मैं सोई
सुबह होने पर जिंदा हूं तो
बिस्तर छोड़
दिन भर के लिए
एक उम्मीद का दामन थामकर
उठूंगी तो अवश्य ही
सुबह होने पर
सूरज को निहारना है
फूलों को खिलते देखना है
परिंदों को चहचहाता सुनना है
आकाश की छटा से भाव विभोर
होना है
इस जग में चहुं दिशाओं में
फैलता उजियारा
अपने आंचल में समेटना है
लोगों के मुस्कुराते चेहरों को
देखकर खुद में खुश और
प्रेरित होना है
मुझे सुबह उठकर केवल
वह दिन कैसे ठीक से गुजारो
यह सोचना है
इससे ज्यादा कुछ नहीं
प्रकृति के सानिध्य में रहना है
दुनिया में जब तक रहना है
उससे जुड़ी गतिविधियों को
जानते रहने का प्रयास करना है
सबसे महत्वपूर्ण यह कि
खुद को भी पर्याप्त समय
देना है
काया को एक दर्पण सा
दमकता हुआ बनाना है
मन में तो बस
एक मंदिर ही निर्मित कर
लेना है
उसकी देहरी पर खड़े होकर ही
हर नई सुबह का उगता सूरज
देखना है और
हर शाम उसके अहाते में एक
दीपक प्रज्वलित करना है।
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