सफर-ए-जिंदगी


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यह जिंदगी कोई मंजिल नहीं, बस एक सफर का नाम है
हर मोड़ पर किरदार बदलते हैं, बस किराया तमाम है  
बचपन की रेल में खिड़की की सीट के लिए झगड़े थे
अब जवानी की ट्रेन में बस एक कोने की जगह का पैगाम है
कुछ स्टेशन आये जहां हंसी के गुब्बारे बिकते थे  
कुछ ऐसे भी जहां आंसुओं का टिकट कटता था
कुछ हमसफर मिले जो अगले जंक्शन पर उतर गये  
और कुछ अजनबी थे जो बिना टिकट ही दिल में घर कर गये
यह सफर अजीब है, यहां सामान कम, बोझ ज्यादा है  
उम्मीदों की गठरी, जिम्मेदारियों का तकिया-तंबू लादा है  कभी धूप में जलते हैं, कभी बारिश में भीगते हैं  
पर रुकते नहीं क्योंकि रुकने का मतलब ही फ़ना है
बुजुर्गों ने कहा था – सफर में सब मिल जाता है  
सच था, पर यह नहीं बताया था कि सब खो भी जाता है  
वो खिलौने, वो दोस्त, वो पहला इश्क, वो मां की लोरी  
सब किसी न किसी स्टेशन पर छूटते चले गये
फिर भी यह सफर खूबसूरत है क्योंकि यह चल रहा है  
हर धड़कन एक नई पटरी, हर सांस एक नया इंजन है  
हम मुसाफिर नहीं, हम खुद ही यह चलती हुई ट्रेन हैं  
और हमारी यादें – बस खिड़की से दिखते गुजरते मंज़र हैं
तो शिकायत कैसी? शुक्रिया अदा करो इस सफर का
जो मिला उसे जियो, जो न मिला उसका सबब समझो  
क्योंकि आखिरी स्टेशन पर जब हिसाब मांगा जायेगा  
तो मंजिल नहीं पूछी जायेगी, सफर कैसा कटा, ये पूछा जायेगा।


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