यह सभ्यता की निशानी नहीं


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परसों सूरज का तापमान बहुत गर्म था
कल वही सूरज बादलों से ढका था
आज तो वह नदारद है
कोहरे की चादर से ढका होने के कारण
आंखों को दिख ही नहीं पा रहा
हर पल कुदरत अपने रंग बदलती रहती है
ऐसे ही इसकी गोद में पल रहा हर प्राणी भी
ऐसा मालूम होता है जैसे
सब हैं नकलची बंदर
एक दूसरे की नकल बखूबी उतार लेते हैं
किसी की बुराइयों को एक भूखी बिल्ली की
तरह ही
झपटकर जैसे वह अपने शिकार को
पकड़ती है
ठीक वैसे ही पकड़ते हैं
किसी की अच्छाइयों के फूल पर
एक भंवरे से मंडरायें और
उसको अपनी अंतर्मन के दर्पण में
उतार पाने की चेष्टा करें और
उसमें सफल भी हों तो
कितना अच्छा हो
एक खिले हुए फूलों के बाग में
तितलियों से इधर से उधर घूमें तो
भी यह दृश्य सही है
बंदरों की तरह उत्पाद मचाकर
सब कुछ तहस-नहस कर दें
यह सभ्यता की निशानी नहीं।


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