प्रकृति में बिखरा
नीला चमकीला रंग
चाहे हो वह सुबह के नभ का या
शांत पानी का
मन में शांति, नीरवता, सुकून के भाव, पवित्रता और निडरता का संचार तो करता ही है
यह नीलिमा प्रकृति की विशालता और उसमें व्याप्त स्थिरता का प्रतीक है
यह चमकीला नीला रंग जो क्षितिज तक फैला हो तो
वह प्रकृति के सौंदर्य को दर्शाता है
यह नीले रंग का आंचल
कोई न भी चाहे तो भी
उसके सिर पर ओढ़ा ही दिया जाता है
ऐसा प्रतीत होता है कि
इस कायनात के कण-कण में विराजमान भगवान श्री कृष्ण
जो नील वर्ण के हैं
अपना हाथ भक्तों के सिर पर रखकर उन्हें प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते नहीं थक रहे
नील नदी के जल की लहर भी
थोड़ा करीब आकर
कुछ पल के लिए ठहरकर
अपने भक्तगणों को छूती,
उनके पैरों को चूमती,
उन्हें एक असीम आनंद का
अहसास कराती
खुद भी प्रभु की लीला के
गुणगान करती
हंसते खेलते मस्ती में
भजन गुनगुनाती आगे
बढ़ जाती है
यह नीला सौंदर्य यही संदेश
जन-जन तक पहुंचाता है कि
हे मानव
तुम रूको नहीं
थको नहीं
हिम्मत मत हारो
अपने कर्म निस्वार्थ भाव से करो
डरो नहीं
इस संसार के कण-कण में
प्रभु समाये हैं जो
तुम्हें हर पल देख रहे हैं
तुम्हारी रक्षा कर रहे हैं
तुम्हारे दिल की गागर में
नीले जल की धारा का एक
पवित्र समुन्दर हर क्षण भर रहे हैं।
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