नभ में
खिला सूरज का प्रकाश और
उसके तले
फूलों का एक समूह
अपना सीना ताने खड़ा
मुस्कुराता है
सबके चेहरों पर मुस्कान खिली है
कोई अपनी आंखों में आंसू भरकर
एक पल को भी न मुरझाता है
सब एक दूसरे को
हौले हौले सहलाते हैं
कुछ समझदारी से भरी बातें
समझाते हैं
एक दूसरे को
गुदगुदाते हैं
बहलाते हैं
हवाओं के ताजे झोंकों से
खुद को नहलाते हैं
जैसे प्रसन्न है यह सब खुद में
वैसे ही प्रसन्नता से
सबको भरे चले जाते हैं।
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