तुम्हारी हया की लाली


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प्रेम पत्र खोलते ही
बिखरे तुम्हारे गुलाबी आंचल में
गुलाब की पंखुड़ियों के बेशुमार
महकते हुए टुकड़े
तुम्हारा चेहरा बन गया एक
खिलता हुआ दर्पण और
समा गये उसमें यह तरोताजा गुलाब की असंख्य पंखुड़ियां जैसे
मोहब्बत का एक सजीला गुलशन
मैंने देखा तुम्हारा मुख मंडल
लज्जा से लाल होते
तुम्हारी नशीली आंखों की
चिलमन को जमीन की तरफ
झुकते, धंसते और फिर
आहिस्ता आहिस्ता बंद होते
तुम्हारे सुरीले सपनों में मेरा
प्रवेश होते
तुम्हारे दिल की गहराइयों में
अपना स्थान ग्रहण करते
तुम्हारे अधरों को चूमते
तुम्हारे कदमों में सिर नवाते
तुम्हारे काले घने बिखरी लताओं से
केशों को अपनी अंगुलियों के पोरों से सहलाते
तुम्हारे हृदयतल में ही कहीं
अपने सपनों का हम दोनों घर
बसाते
तुम्हारी हया की लाली एक पल को भी
न कम हुई प्रिये
यह तो सुबह के चढ़ते सूरज की
लालिमा सी लाल है
यह बनी रहेगी देर तक ऐसे ही
यह जब सांझ होने पर ढलेगी
तब भी होगी शर्म का
नारंगी आवरण ओढ़े ही।


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