ग्रीष्म : एक तपस्वी का आलिंगन


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ये सिर्फ ऋतु नहीं
ये तपस्या का दूसरा नाम है
ये सूरज का धरती से किया सबसे उजला प्रणाम है
जब छतें तवे सी तपती हैं और हवाएं अंगार बन जाती हैं
तब समझो प्रकृति ने सोना गलाने की भट्ठी लगाई है
ये वो मौसम है जब दोपहरी में सड़कें भी मौन हो जाती हैं
और नीम की छांव में बूढ़ी दहलीजों की कहानियां सो जाती हैं
मटके का पानी अमृत लगता है
खस की टट्टी जन्नत लगती है
और पसीने की हर बूंद में एक नई कीमत लिखी जाती है
ग्रीष्म, तुम केवल गर्मी नहीं,
तुम जीवन का व्याकरण हो  
तुम सिखाती हो कि छांव की कीमत क्या होती है
तुम्हारी लू जब चेहरे पर तमाचे सी पड़ती है  
तब आदमी को अपनी औकात और दुआ दोनों याद आती हैं
तुम्हारे ही दामन में आम के बौर की महक पलती है
तुम्हारी ही गोद में रातरानी चुपके से खिलती है
तुम क्रूर हो पर कंजूस नहीं
फल तुम ही सबसे मीठे देती हो
तुम जलाती हो पर उसी आग में रिश्तों को पक्का भी करती हो
सांझ ढले जब आंगन में छिड़काव होता है  
और परिवार का खाट पर बैठकर तारों से संवाद होता है  
तब लगता है तुम शाप नहीं, ईश्वर का वरदान हो
तुम थकान हो पर उसी थकान में सबसे गहरा विश्राम हो
इसलिए हे ग्रीष्म, तेरा अभिनंदन है, तेरा वंदन है
तू तपती है ताकि भीतर का सोना निखर सके
तू रुलाती है ताकि पहली बारिश की कीमत समझ आये
तू जलाती है ताकि आदमी फिर से आदमी बन पाये।


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