यह आइसक्रीम नहीं, वक़्त का जमा हुआ एक टुकड़ा है
जिसे होंठों पर रखते ही सबसे पहले बचपन पिघलता है
कुल्फी वाले की घंटी और स्कूल की आखिरी घंटी
दोनों का स्वाद एक सा था – आजादी का, बेफिक्री का
यह ठंडी नहीं है, यह लम्हा है जो उंगलियों से फिसलता है
इसे जीभ पर नहीं, सांसों पर रखकर महसूस किया जाता है
क्योंकि यह जानती है कि इसका वजूद कुछ पलों का मेहमान है
इसलिए यह हर पल को आखिरी समझकर मीठा कर जाती है
दुनिया इसे चॉकलेट, वैनिला, स्ट्रॉबेरी के नाम से बुलाती है
पर मैं इसे 'सब्र' कहती हूं जो धीरे-धीरे लेना पड़ता है
जल्दी करोगे तो ये दिमाग तक सुन्न कर देगी,
ठहरकर खाओगे तो रूह तक को ठंडक दे जायेगी
मोहब्बत भी तो आइसक्रीम जैसी ही होती है
शुरू में ठंडी, रंगीन, और दिल को लुभाती है
पर वक़्त की धूप में अगर संभालकर न रखा
तो हाथ में बस एक मीठा सा पछतावा रह जाता है
बूढ़ी दादी के झुर्रियों वाले हाथ में जब कोन आता है
तो लगता है उम्र भी दो पल को बच्ची बन जाती है
और टपकती हुई बूंद को देखकर वो जो डांटती है
"अरे, गिर रही है, जल्दी खा"
उस एक जुमले में पूरी परवरिश छुपी होती है
इसलिए ऐ आइसक्रीम, तू बस मिठाई नहीं, फलसफा है
तू सिखाती है कि सबसे हसीन चीजें नाजुक होती हैं
तू बताती है कि जिंदगी भी तेरी तरह है
अगर पिघलने से डरोगे, तो जीना कब सीखोगे?
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