कहीं स्वागत करने के लिए किसी का


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मैं स्वागत करती हूं
हर दिन
सुबह उठने पर
अपनी जिंदगी के सफर की
एक नई शुरुआत का
एक ताजे खिले फूल सी
उम्मीद के साथ
एक नये सपनों को अपने
नयनों में भर
मन में जगे
एक नये विश्वास के साथ
एक दिल में उठती
पहली हिलोर के साथ
एक तन में लहराती नई नवेली दुल्हन की
उमंग की तरंग के साथ
हां यह सच है कि
मैं इस दुनिया में विद्यमान
हर छोटी बड़ी चीज के प्रति
आकर्षित होती हूं
उसे पाना चाहती हूं
उसे अपनाना चाहती हूं
उसे दिल से प्यार करती हूं
उसको अपनी हृदय की गहराइयों में बसाना
चाहती हूं
उसका खैरमकदम अपनी बाहें फैलाकर
करती हूं
उसे कहीं से भी अपने से अलग
करने का विचार
अपने अंतर्मन में कहीं न लाना
चाहती हूं
फूल हों या कांटे
मेरे लिए हर कोई एक समान है
मेरी आंख सबको एक स्वरूप
देखती है
कहीं कोई भेद नहीं
कोई छल नहीं
कोई द्वेष नहीं
इस तरह की सोच होने का
मकसद बस इतना भर कि
आज मैं जीवित हूं और
इस योग्य भी कि
आगे बढ़कर कर सकती हूं
किसी का भी स्वागत
कल हो सकता है
मैं रहूं लेकिन
मेरे सामने कोई न हो या
फिर इस दुनिया में
सब कुछ मौजूद हो लेकिन
कहीं स्वागत करने के लिए
किसी का
मैं ही न रहूं।


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