एक ही शहर में


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एक ही शहर में दो सुबह होती हैं,
एक सुबह अखबार के साथ कॉफी पीती है,
दूसरी सुबह कचरे में अखबार बीनती है।

एक के पैरों में जूते हैं, जो काटते नहीं,
दूसरे के पैरों में छाले हैं, जो भरते नहीं।

हम कहते हैं सब बराबर हैं,
पर ये बराबरी किताबों में ही क्यों दिखती है?
मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा वो बच्चा,
भगवान से रोटी माँगता है,
और अंदर बैठा पुजारी,
उसी भगवान से सोना माँगता है।

एक ही क्लासरूम है,
पर दीवार खिंची है अदृश्य सी,
एक बच्चा इंग्लिश में डर बोलता है,
दूसरा डर के मारे इंग्लिश नहीं बोलता।

किसने बनाया ये फर्क?
ऊपर वाले ने तो एक ही मिट्टी से सबको गढ़ा था,
फिर ये ऊँचा-नीचा, छोटा-बड़ा,
ये किसने पढ़ाया था?

ये असमानता दीवारों में नहीं,
हमारी नज़रों में है।
जिस दिन हम इंसान को
उसके कपड़ों से नहीं, उसके दिल से देखेंगे,
उस दिन शायद ये दो दुनिया,
एक दुनिया बन जाएगी।


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