मेरी मंजिल
मुझे पुकार रही है लेकिन
मेरे दिल में
अब उसे पाने की चाह नहीं रही
उस तक पहुंचने के रास्ते
कठिनाइयों भरे हैं और
मेरे जिस्म में अब ताकत नहीं बची
मेरे में सुबह के उगते सूरज की
ऊर्जा अब नहीं रही है
मैं हो गई हूं
सांझ के ढलते एक सूरज सी क्षीण
नदी के किनारे लगी
एक जर्जर नाव सी कमजोर और
एक सूखे पेड़ की सूखी शाख से झड़ रहे उसके एक सूखे पत्ते सी ही।
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