यह गुलाब के फूल और
कलियां हैं बेहिसाब लेकिन
बिना कांटों की
इन्हें महफूज रखने के लिए
न जाने कौन आया कहां से
जिसने सारे कांटे इनके दामन से
चुन लिये
कौन था इनका शुभचिंतक
इन्हें ताउम्र पता भी न चला
यह शुक्रिया करें भी तो किसका
इन्होंने तो बस इतना भर सोचा है कि
इस अहसान के बदले
यह अपनी देह और आत्मा की
सुगंध को सर्वस्व लुटाती रहेंगी
जाने अंजाने इससे लाभान्वित
होगा इनका वह इकलौता शुभचिंतक
चाहने वाला भी।
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