मोबाइल की घंटी झनझना रही थी। मैंने लपककर उसे उठाया तो मेरी प्रिय मित्र और हमदर्द रचना एक ही सांस में तेज रफ्तार से बोली, 'दीदी, डॉक्टर गुप्ता ने आज अपने घर पर लंच रखा हुआ है। वह आपको भी साथ लाने के लिए कह रहे थे। वह मुझे लेने के लिए अपनी कार भेज रहे हैं। आज उनके जुड़वा बेटों का जन्मदिन भी होता। मैं तो जल्दी से तैयार होने जा रही हूं। आप भी जल्दी से हो जाओ।'
मैंने फौरन हामी भर दी और झटपट तैयार हो गई। नये साल का दूसरा दिन, जन्मदिन, किसी का इतने प्यार और आदर से आग्रह करना।
सर्दी बहुत थी लेकिन दिल में उत्साह भी एक हिरण के बच्चे सा कुलांचे मार रहा था। मेरा पार्टी में जाने के पीछे का सबसे बड़ा कारण था डॉक्टर अंकल और रचना का प्रेम और सम्मान भरा आग्रह जो आजकल प्रायः लुप्त सा होता जा रहा है। कभी कहीं भी कोई इतने प्रेमपूर्वक और सम्मानपूर्वक भाव से बुलाये तो अवश्य चले जाना चाहिए। मैंने मन ही मन सोचा कि आज के वातावरण में भावनाओं का तो दमन सा हो गया है। परिवार में दूर दूर तक कोई ऐसा दिखता नहीं जो इस तरह का व्यवहार करता हो। रिश्तों का रंग फीका पड़ चुका है। आजकल तो कोई आपकी अंगुली पकड़कर थोड़ा सा भी यह जीवन का रास्ता पार करा दे तो उसका अहसान ताउम्र मानते हुए उस पर फूलों से भरी दुआओं की बारिश अपनी आखिरी सांस तक करते रहना।
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