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आकाश दीप: उमा नटराजन द्वारा रचित कविता

आस का उजास लिए प्रज्जवलित है, मेरे आंगन का आकाश दीप
हृदय की अनंत जलनिधि में अरुणिमा प्रस्फुटित कर कल्लोल करती उसकी लहर
रवि की किरणों से झरते पीले अक्षत और मौलश्री की डाली का आलाप लिए आकाश दीप
मेरे आंगन के वक्ष पर विलम्ब मयी राग रजिंत सुनहरी सांझ की थिरकती प्रहर

नव यौवना का श्रृंगार लिए चांदनी को छलनी से झांकते नव आकाश दीप
अंतरिक्ष में मानो उज्जवल नवल नक्षत्रों की झिलमिलाहट का बिखेरे मधुर कहर
मानो मंदिर की घण्टियां और शंखनाद, शेफाली की शहद घोलती ज्योतिर्मयी दीप
जैसे आलोकमय प्रभात को शीतल मंद पवन से सुशोभित करती संदली महक की सहर

पिंजड़े के सुओं को पंख फड़फड़ाते कैद से उन्मुक्त उड़ान भरवाते गगन दीप
मानो उच्छंकृल शैलमाला के शिखर पर हरियाली नील पिंगल करते स्वप्न विहार
धूंधमयी जीवन का आधार दिव्य दीप, चिरदीप वरदान आकाश दीप
सतरंगी कंदील की जगमगाहट लिए सम्मोहन की क्रिया से परिपूरित भ्रमर

कंदील की रोशनी, मिठास बरसाती उसकी मलय के साथ संवाद शैली लिए जैसे मोती संग सीप
नव उद्वेग भर, आशा का संचार कर , हर्षोल्लास की फुलझड़ी छोड़ती उसकी डगर
विहंगम छटा बिखेरे नीलांबर को देदीप्यमान करने में अविचलित आकाश दीप
तू प्रफुल्लित कर, प्रकाश पुंज प्रस्फुटित कर, मानस उर में नवचेतना भर सातों पहर