Diya aur baati: A poem by Dr. Aparna Pradhan


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आओ चारों ओर प्रकाश फैलाएँ
रूहानी इश्क़ जताकर
बाती बोली दीये से
मन्नत का धागा बन कर
मै तुझ में समा जाऊँ
तुम्हारी अर्धागिनी बन कर
तुम्हारा अभिन्न हिस्सा हो जाऊँ
जीवन साथी बन कर
तुम्हारी साँसों में घुल जाऊँ
ए मेरे हमसफ़र – ख़ुद को निस्सवार्थ जला कर
आओ चारों ओर प्रकाश फैलाएँ
मन-मंदिर के अंधकार को
चलो अपनी रोशनी से नहलाएँ
नफ़रत का तमस दूर भगा कर
प्यार की पावन अग्नि जलाएँ
निराशा के बादल हटा कर
उम्मीद की रश्मि घर घर जगमगाएँ
उदास नयनों में आशा की किरण बन कर
ख़ुशियों की उमंग से चेहरे पर चमक लाएँ
ए मेरे हमसफ़र – ख़ुद को निस्सवार्थ जला कर
आओ चारों ओर प्रकाश फैलाएँ
हर आँगन में तुम संग जगमगा कर
जात-पात अमीरी-ग़रीबी की दीवार गिराएँ
अहंकार हटा कर हर दिशा में
नवल ज्योति से प्रेम का नगर सजाएँ
सीमा पर रक्षा करने वाले
वीर जवानो की याद में
चलो आज हम तुम जल कर
देश भक्ति का जोश जगाएँ


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