वो बंधन सिर्फ दो दिन का त्यौहार नहीं है,
वो एक पूरी उम्र का एहसास है।
याद है बचपन में,
जब आंधी आती थी तो भाई दौड़कर खिड़की बंद कर देता था,
जब मैं साइकिल से गिरती थी तो पापा बिना कुछ कहे मरहम लगा देते थे,
जब मैं रात भर पढ़ती थी तो माँ चुपके से चाय रख जाती थी।
हमने तब उसका नाम नहीं पूछा,
आज समझ आया, उसी को रक्षा का बंधन कहते हैं।
रक्षाबंधन पर बंधा वो कच्चा धागा,
देखने में तो कितना नाजुक है,
पर उस धागे में एक भाई की पूरी उम्र की कसम बंधी है।
उसने कहा था – तू डर मत, मैं हूँ।
आज तक जब-जब दुनिया ने डराया,
मैंने आँखें बंद की और वही आवाज सुनी – मैं हूँ।
और सारा डर कांच सा टूट गया।
ये बंधन सिर्फ भाई-बहन का नहीं,
ये हर उस रिश्ते का है,
जहाँ कोई तुम्हारे बिना कहे,
तुम्हारी लड़ाई अपनी बना ले।
पिता की वो चप्पलें जो खुद घिस गईं पर बेटी को नए जूते दिला गईं,
पति का वो हाथ जो भीड़ में तुम्हारा हाथ और कसकर पकड़ ले,
दोस्त का वो कंधा जो तुम्हारे आंसुओं पर कोई सवाल न करे।
ये बंधन शोर नहीं करता,
ये तुम्हारे आगे ढाल बनकर नहीं, पीछे दीवार बनकर खड़ा होता है,
कहता है तू आगे बढ़, तू लड़, मैं संभाल लूंगा।
धागा अगर टूट भी जाए तो क्या हुआ,
कलाई पर बंधा वादा कभी नहीं टूटता।
क्योंकि कुछ धागे कलाई पर नहीं,
सीधे दिल पर बंधते हैं।
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