मेरे भीतर निहित अजनबी को


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इस दुनिया में
अपना कौन है
देखा जाये तो
कोई नहीं
सब पराये हैं
परिचित भी कोई नहीं
सब अपरिचित हैं
अंजान हैं
अजनबी हैं
इस भीड़ की बात छोड़ो
पहले खुद से ही एक सवाल कि
मैं खुद को कितना समझ पाई हूं
मैं कौन हूं
मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है
मैं कहां से आई हूं
मैं अंततः कहां खो जाऊंगी
इस जीवन का अंत होने से पहले
क्या कभी मैं खुद के भीतर बैठे
किसी अजनबी को पहचान पाऊंगी
इसका उत्तर है 'नहीं'
मैं इस अजनबी को कभी
थोड़ा सा पहचानती हूं क्योंकि  
इसकी शक्ल, अक्ल और
आदतें मुझसे हूबहू मिलती हैं लेकिन
अगले ही पल
उस अजनबी पर जमे विश्वास को
मैं खो देती हूं
वह अजनबी मेरा ही हम साया है लेकिन
मैं उसे जानकर भी नहीं
जानती हूं जैसे
हम जीवन को जीते हैं पर
'जीवन क्या है'
यह सारी उम्र समझ नहीं
पाते हैं
मेरे मन में उपजते
सवालों का
मैं कभी कोई सटीक जवाब
तलाश नहीं पाती हूं
मैं खुद को और
मेरे भीतर निहित अजनबी को
पूर्णता से जानते हुए भी
शायद थोड़ा बहुत भी जान नहीं पाती हूं।


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