रंग बदल गया दरख्तों का


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मौसम ने बदला रंग, पता ही न चला कब
कल तक जो पत्ते हरे थे, आज वो केसरिया लिबास में  
हवा ने चुपके से फुसफुसाया कुछ
और सारा जंगल राज समझ गया
धूप अब वैसी नहीं रही  
वो पहले सीधी लगती थी
अब तिरछी होकर आती है  
जैसे बाप की डांट में छिपा हुआ आशीर्वाद
बादल काले नहीं हुए, बस गहरे हो गये
जैसे जिंदगी उम्र के साथ  
बारिश अब बरसती नहीं, बस याद दिलाती है  
कि जो गिरता है, वही तो उगता है
मैंने देखा, पीपल का पत्ता एक-एक करके उतर रहा है
कोई शोर नहीं, कोई शिकवा नहीं  
बस एक सलीका है मरने का  
चुपचाप, अदब से, जमीन को चूमकर
और मैं समझ गई  
रंग बदलना बिछड़ना नहीं होता
रंग बदलना तैयार होना होता है  
किसी नए आगाज के लिए
जो आज पीले हैं, कल वो मिट्टी बनेंगे
और उसी मिट्टी से फिर हरियाली फूटेगी
मौसम बस यही सिखाता है  
रुकना नहीं, बदलते रहना है
क्योंकि जो नहीं बदला
वो वक्त की धूल में दफन हो गया
मैं भी अब बदल रही हूं  
न गम में, न खुशी में  
बस एक मौन में  
जैसे मौसम बदलता है  
बिना किसी को कसूरवार ठहराए।


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