रास्तों में ही कहीं


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मैं जहां से चलती हूं
घूम फिरकर वहीं वापिस
पहुंच जाती हूं
मंजिल पर पहुंचने की कोशिश तो
करती रहती हूं पर
रास्तों में ही कहीं भटक जाती हूं
मैं जिस तक पहुंचना चाहती थी
वह ही मुझे ढूंढते ढूंढते
मुझ तक आ जायेगा
उसे होगी जो मेरी जरूरत
मैं फिर ऐसा करती हूं
उसका इंतजार देखती हूं और
एक सुरक्षित जगह पर मुंह पर अंगुली रखकर
चुपचाप खड़ी हो जाती हूं।


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