वो बैठा था, अपनी तकदीर की लकीरें गिन रहा था
मैंने पूछा, "पंडित से दिखवा लीं?"
हंसकर बोला, "नहीं, समय के हाथ देख रहा हूं
वो हर पल नई लकीर खींचता है, पुरानी मिटाता है
हम सोचते हैं, हम समय को काट रहे हैं
घड़ियों की सुइयां तोड़कर, कैलेंडर फाड़कर
सच ये है कि समय हमें काट रहा है
हर सांस के साथ उम्र की रोटी से एक निवाला तोड़कर
ये समय ही है जो राजा को रंक, रंक को राजा करता है
ये समय ही है जो महलों को खंडहर, खंडहर को तीर्थ बनाता है
हम लड़ते हैं, झगड़ते हैं, मेरा-तेरा करते हैं
और समय चुपचाप हमारा नाम मिटाकर, नया नाम लिखता है
तुम्हारे पास जो है, वो तुम्हारा नहीं, समय की अमानत है
ये जवानी, ये ताकत, ये सिक्कों की खनक, ये हुकूमत है
कल जब समय हिसाब मांगेगा तो क्या लौटाओगे?
कफन में जेब नहीं होती और राख का कोई मोल नहीं होता
इसलिए ऐ आदमी, घमंड मत कर,
तू सिर्फ एक किरायेदार है इस सांस के मकान का
मालिक ऊपर बैठा है और उसका मुंशी – समय
हर पल तेरा हिसाब लिख रहा है, बिना कलम उठाये।
तो डर मत, पर भूल मत
तेरे पास जो सबसे कीमती है, वो सोना नहीं, समय है
और जब आखिरी घंटा बजेगा,
तो लोग नहीं पूछेंगे कितना कमाया, पूछेंगे कितना जिया।
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