ये कपड़ा नहीं, मेरे पुरखों का लहू है,
जो केसरिया में तप कर,
सफेद में सच बनकर,
हरे में लहलहा रहा है।
15 अगस्त सिर्फ एक तारीख नहीं,
ये वो सुबह है,
जो लाखों शहादतों के बाद आई है।
मैंने देखा नहीं भगत को, आज़ाद को,
पर जब तिरंगा लहराता है,
तो लगता है,
वो सब यहीं कहीं आस-पास हैं।
कभी-कभी सोचती हूँ,
देश क्या है?
नक्शा? जमीन? सरहद?
नहीं,
देश तो वो एहसास है,
जो "जन गण मन" सुनते ही
आँखें नम कर देता है।
आज वादा है खुद से,
झंडा सिर्फ लहराएंगे नहीं,
इसकी शान में जिएंगे भी।
जय हिन्द!
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