एक उम्मीद का दीया


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रिश्तों की डोर
इतनी कमजोर है कि
अब थामी नहीं जा रही
इंसान तो दिखता है पर
इंसान जैसी इसमें कोई बात नहीं
लाख समझाया मैंने अपने मन को लेकिन
अब मैं इसे किसी हाल में भी
इंसान मान नहीं पा रही
इस बेशुमार टुकड़ों में बंटे रिश्ते को
मैं तो अब ढो नहीं पाऊंगी
इस बेमतलब के बोझ को
मुझे अपने सिर से उतारकर
फौरन ही कहीं फेंक देना है
इन्हें अपनी आंखों से कर देना है
हमेशा के लिए ओझल और
जिंदगी के नये रास्ते पर
एक उम्मीद का दीया फिर से
जलाना है।


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