आवाजों का शोर जो
मुझे न सुने
कोई मुझे मेरा नाम लेकर
पुकारे नहीं
कोई मुझे जो याद न करे तो
मन को कितनी शांति मिलती है
एक मरुस्थल की वीरानगी सी
तेज हवा भी चले तो
न इसकी रेत उड़ती और
न ही पेड़ों पर लगा कोई
टहनी या पत्ता
प्यास भी ऐसी लगती है कि
पानी पीने की चाहत नहीं होती और
न ही सूखते हैं होठ
ऐसा महसूस होता है कि
मैं जीवित हूं लेकिन
एक मृतक समान
अपनी ही बंद कब्र में बैठकर
जीते जी देख रही हूं
दुनिया का बर्ताव मेरे साथ और
वह ऐसा जैसे मैं जिंदा होते हुए भी
नहीं हूं जिंदा बल्कि
मर चुकी हूं
इस दुनिया से रुखसत हो चुकी हूं
एक जमीन के भीतर दफन हो चुकी हूं।
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