तुम्हारे अवसान के पश्चात
मेरा दिल एक गहरे लेकिन शांत दुख में
डूब गया है
मेरा स्वर बुझ गया है
मेरी अंतरात्मा सूख गई है
मेरे मस्तिष्क के पटल पर
उदासीनता के बादल छा गये हैं
मेरे जिस्म के हर कतरे में नीरसता ने
बसेरा कर लिया है
मेरी स्मरण शक्ति धीरे-धीरे
क्षीण हो रही है
मेरे जीवन में शून्यता
पहरा दे रही है
मैं अपने अहसासों को पूरी तरह से
व्यक्त नहीं कर पा रहा हूं
मैं भीतर ही भीतर राख की तरह
जम गया हूं
समय की नश्वरता,
जीवन के संघर्ष और
अंततः हर चीज का अंत में
मिट्टी या राख में
परिवर्तित हो जाना खामोशी की
एक कहानी कहते हैं
अपनी प्रियजन को भूलना
एक असंभव कार्य प्रतीत होता है
उसकी मृत्यु एक बहुत बड़ी
हानि से कम नहीं होती है
उसके साथ गुजारे पल यूं तो
वापिस लौटकर नहीं आते लेकिन
उसकी राख से एक जीवंत
तस्वीर बनाने से भी जो
शोक की लहर है वह
थम नहीं पाती
राख जल में बह जाती है या
हवाओं के साथ कहीं उड़ जाती है
लेकिन दुख संताप की
गहरी चोट के घाव को गुजरते
समय की मरहम भी कभी
भर नहीं पाती।
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