प्रकृति के रंगों में से
मैं नीला रंग चुनती हूं और
उसे प्रेमपूर्वक निहारती
अपनी आंखों में भरती हूं
आंखों के रास्ते
उसे फिर अपने दिल में उतारती हूं और
जब तक मैं हूं जीवित
उसे अपने अंतर्मन में बसाती हूं
नीले आकाश की चुनर अपने
सिर पर ओढ़ती हूं
नील नदी में स्नान करके
खुद की आत्मा को शुद्ध करती हूं
अपने मन मंदिर में बैठकर
भगवान श्री कृष्ण की आराधना करती हूं
जो इस नीले रंग को खुद में समाहित कर
स्वयं भी है नील वर्ण के ही।
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