मोहब्बत की राह में


0

गुलाब ही गुलाबसजे थे
फूलों से भरी दुकानों में
कांटों का कहीं
नामोनिशान न था
वह बिखरे पड़े थे
मोहब्बत की राह में
पीछे छूटते श्मशानों में
गुलाब सारे गुनाह करके भी
खुद पर इतराते हुए महक रहे थे
कांटे बेकसूर थे
उनकी आंखों में अभी भी
शर्म थी बाकी
वह असमंजस की स्थिति में थे
मोहब्बत की बाजी छोड़
अब तो जिंदगी की जंग भी
वह हार चुके थे
इस दुनिया से रुखसत हो रहे थे
यह फूलों के गुलिस्तान छोड़ते हुए भी
वह गुलाबों से अपनी मोहब्बत को
तहे दिल से याद करके
बेहिसाब रो रहे थे।


Like it? Share with your friends!

0

0 Comments

Choose A Format
Story
Formatted Text with Embeds and Visuals