कल शाम फोन पर अशोक भैया से काफी समय पश्चात एक लंबी वार्तालाप हुई। उनके बारे में बस इतना समझ लीजिए कि मेरे मां-बाप की मृत्यु के बाद वह ही मेरे रखवाले हैं। उनके सामने पैदा हुई, उनके हाथों खेल-कूद कर बड़ी हुई तो उनके और मेरे बीच रिश्ता एक अभिभावक और उसके बच्चे जैसा ही है।
अशोक भैया ने पहला वाक्य कहा कि परसों रात दिल्ली में रह रही उनकी भाभी गुजर गई। उनके पति जो अशोक भैया के छोटे भाई थे वह चार-पांच साल पहले ही चल बसे थे। पिछले महीने पंजाब निवासी उनके जीजा जी का भी स्वर्गवास हो गया था। दिल्ली वाली भाभी जी लंबे समय से बीमार चल रही थी। उनके एक बेटे की शादी हो चुकी थी लेकिन दूसरा अभी अविवाहित है।
दिल्ली से जैसे ही लौट कर आये तो पड़ोस में रह रही एक बुजुर्ग महिला का देहावसान हो गया।
अशोक भैया की पत्नी का भी गुर्दे की पथरी का हाल फिलहाल में ऑपरेशन हुआ और उन्हें भी पूर्ण रूप से स्वस्थ होने में थोड़ा समय लगेगा।
अशोक भैया एक बहुत ही जिंदादिल इंसान हैं लेकिन उम्र बढ़ने पर दिल थोड़ा कमजोर पड़ने ही लगता है, मन आशंकित होने लगता है और यह हर किसी की दिली ख्वाहिश होती है कि वह अपनी बातों को किसी के साथ साझा कर खुद को थोड़ा हल्का कर ले। इस समय घर और बाहर एक दुख का वातावरण बना हुआ है लेकिन उससे बाहर निकलने का उन्होंने प्रयास किया जो सराहनीय है।
वह अंत में बोले, 'हमारे यहां जो मेड काम करती है उसका पति एक बड़े होटल में कुक है तो कुछ दिनों के लिए उसे अपने यहां खाना बनाने के लिए रख लिया है। बिल्कुल होटल जैसा लजीज खाना बनाता है। एक दिन तो मैंने उससे घर में मुर्गा भी बनवा लिया।'
यह कहकर उनके बुझे मन में फिर एक उल्लास की किरण लहराती हुई दिखी। मैंने भी सोचा कि चलो एक दुख की लहर में कुछ तो चमकता हुआ अपने मन का सा हुआ।
एक मुर्गा जान से गया लेकिन जाते-जाते खाने वाले के मुरझाए होठों पर मुस्कान तो बिखेर गया। यहां कम से कम किसी को यह मुहावरा तो दोहराने की जरूरत नहीं पड़ेगी कि मुर्गा जान से गया पर खाने वाले को मजा नहीं आया।
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