वो फूल बागीचे के


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वो फूल बागीचे के
हवाओं के संग झूमते
कुछ कहने को बेताब
अपनी सुगंध, रंग, कोमलता
यह सब कुछ जो कोई मांगे तो
उसे देने को तैयार लेकिन
किसे है फुरसत कि
जो दो पल उसके पास ठहरकर
सुने उसके दिल का हाल
उसकी भाषा किसी को
समझ नहीं आती तो
क्या उसका मौन भी
समझ नहीं आता
किसी को कुछ भी समझ नहीं आता
कोई उसके करीब जाता भी है तो
अपने फायदे के लिए
वह कुछ कहने को अपने लब खोले
उससे पहले तो उसे तोड़ लिया जाता है
एक झटके में उसकी सारी आशाओं पर
पानी फेर दिया जाता है
इससे अच्छा होता कि वह किसी से
हमदर्दी की कोई उम्मीद ही
जो न बांधता
उसकी किस्मत में
यही होना लिखा था
उसकी सुंदरता, अच्छाई, भलाई
ऐसा कुछ भी तो काम नहीं आया
इस बेरहम दुनिया में
जाते-जाते वह अधमरा सा
यह संदेश देता जा रहा था कि
कभी भूले से किसी को प्यार मत करना,
याद मत करना,
कभी अपनी राह पर चल रहे किसी बेफिक्र मुसाफिर को आवाज मत देना।


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